तीन दिन से अस्पतालों के चक्कर काट रहा आम आदमी, रेबीज संदिग्ध स्ट्रीट डॉग की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं व्यवस्था
नगर निगम ने कहा—हमारे पास शेल्टर उपलब्ध नहीं, सरकारी पशु अस्पताल से भी नहीं मिला समाधान; फरियाद हुसैन ने काम छोड़ा, अब सवाल—आखिर इस बेजुबान की जिम्मेदारी किसकी?
हल्द्वानी। शहर में एक घायल और रेबीज संदिग्ध स्ट्रीट डॉग को लेकर सरकारी व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एक तरफ एक आम नागरिक फरियाद हुसैन पिछले तीन दिनों से अपना काम छोड़कर इस बेजुबान जानवर को लेकर अस्पतालों और सरकारी कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं, वहीं दूसरी ओर संबंधित विभागों के बीच जिम्मेदारी को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
फरियाद हुसैन के अनुसार उन्होंने सड़क पर गंभीर हालत में पड़े इस स्ट्रीट डॉग को देखा और इंसानियत के नाते उसे इलाज के लिए अस्पताल पहुंचाया। पशु चिकित्सक की ओर से कुत्ते में रेबीज जैसे लक्षण होने की आशंका जताई गई। इसके बाद मामला केवल एक घायल जानवर के इलाज तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सार्वजनिक सुरक्षा से भी जुड़ गया।

कुत्ते को लोगों और दूसरे पशुओं से अलग रखना जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि जब कोई आम नागरिक ऐसे पशु को अस्पताल तक पहुंचा देता है, तो उसके बाद उसकी जिम्मेदारी कौन उठाएगा?

तीन दिन से काम छोड़कर भटक रहा एक आम नागरिक
फरियाद हुसैन का कहना है कि वह पिछले तीन दिनों से अपना काम छोड़कर इस कुत्ते के लिए समाधान तलाश रहे हैं। एक तरफ उनका अपना रोजगार प्रभावित हो रहा है, दूसरी तरफ वह इस डर में हैं कि अगर कुत्ते को वापस सड़क पर छोड़ दिया गया तो वह किसी व्यक्ति या दूसरे पशु को नुकसान पहुंचा सकता है।
यह स्थिति अपने आप में कई सवाल खड़े करती है।
एक आम नागरिक, जिसके पास न कोई पशु शेल्टर है, न प्रशिक्षित स्टाफ और न ही संक्रमित या संदिग्ध पशु को रखने की सुरक्षित व्यवस्था—वह आखिर कितने दिनों तक इस जिम्मेदारी को अपने कंधों पर उठाए?
नगर निगम ने कहा—हमारे पास शेल्टर नहीं
फरियाद हुसैन का आरोप है कि जब उन्होंने नगर निगम से मदद मांगी तो उन्हें बताया गया कि नगर निगम के पास इस तरह के पशु को रखने के लिए कोई शेल्टर उपलब्ध नहीं है।
यदि यह स्थिति सही है तो सवाल बेहद गंभीर है—शहर में आवारा, घायल और गंभीर रूप से बीमार पशुओं के लिए आपात स्थिति में व्यवस्था क्या है?
अगर किसी नागरिक को सड़क पर कोई ऐसा पशु मिलता है जो गंभीर रूप से घायल है या रेबीज संदिग्ध है, तो उसे किस विभाग के हवाले किया जाए? उसे सुरक्षित तरीके से कौन रेस्क्यू करेगा? उसे आइसोलेशन में कौन रखेगा? और उसके उपचार तथा निगरानी की जिम्मेदारी किस अधिकारी या विभाग की होगी?
आम आदमी में संवेदनशीलता, व्यवस्था में समाधान क्यों नहीं?
इस पूरे मामले का सबसे पीड़ादायक पहलू यही है कि एक आम आदमी ने अपनी परेशानी की परवाह किए बिना एक बेजुबान की जान बचाने की कोशिश की, लेकिन तीन दिन बाद भी उसे स्पष्ट समाधान नहीं मिल पा रहा है।
फरियाद हुसैन के पास इस पशु को रखने की स्थायी व्यवस्था नहीं है। इसके बावजूद वह लगातार अस्पताल और संबंधित विभागों के चक्कर लगा रहे हैं।
दूसरी ओर सरकारी विभागों के पास अधिकारी, कर्मचारी, बजट और संसाधन होने के बावजूद यदि ऐसे मामले में कोई स्पष्ट समाधान सामने नहीं आता, तो व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यह सवाल किसी एक अधिकारी या कर्मचारी पर व्यक्तिगत आरोप लगाने का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की जवाबदेही तय करने का है।
लाखों की तनख्वाह पाने वाली व्यवस्था से जनता पूछ रही है—उपाय क्या है?
जनता टैक्स देती है, सरकारी व्यवस्था को चलाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च होते हैं और अधिकारियों-कर्मचारियों को वेतन मिलता है। ऐसे में एक आम नागरिक का यह सवाल जायज है कि जब कोई गंभीर और संवेदनशील मामला सामने आए तो आखिर तत्काल समाधान देने की जिम्मेदारी किसकी है?
क्या हर समस्या का समाधान यह कहकर किया जा सकता है कि हमारे पास शेल्टर नहीं है?
अगर शेल्टर नहीं है तो वैकल्पिक व्यवस्था कौन करेगा?
अगर पशु अस्पताल में भर्ती नहीं हो सकता तो उसे कहां रखा जाएगा?
अगर रेबीज की आशंका है तो उसकी निगरानी कौन करेगा?
और सबसे महत्वपूर्ण—अगर इस पशु से किसी व्यक्ति को नुकसान हो गया तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
मामला सिर्फ एक कुत्ते का नहीं, व्यवस्था की परीक्षा का है
यह मामला केवल एक स्ट्रीट डॉग की जिंदगी का नहीं है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा है जिसमें आम नागरिक किसी घायल पशु की मदद करने के लिए आगे आता है।
अगर फरियाद हुसैन जैसे लोग यह सोचने लगें कि मदद करने के बाद उन्हें ही तीन-तीन दिन तक सरकारी कार्यालयों और अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ेंगे, तो भविष्य में कितने लोग घायल या बीमार पशुओं की मदद के लिए आगे आएंगे?
एक संवेदनशील समाज की पहचान यही है कि वह बेजुबान जीवों के प्रति भी जिम्मेदारी निभाए। लेकिन संवेदनशीलता केवल आम जनता से नहीं, सरकारी व्यवस्था से भी अपेक्षित है।
प्रशासन से सीधे सवाल
1. रेबीज संदिग्ध स्ट्रीट डॉग के लिए हल्द्वानी में निर्धारित आइसोलेशन व्यवस्था कहां है?
2. नगर निगम के पास शेल्टर नहीं है तो ऐसे पशुओं के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्या है?
3. घायल पशु को अस्पताल पहुंचाने वाले नागरिक की आगे की जिम्मेदारी कौन लेगा?
4. रेबीज की आशंका वाले पशु को सुरक्षित तरीके से कौन रेस्क्यू करेगा?
5. यदि इस पशु से किसी नागरिक या दूसरे पशु को नुकसान होता है तो जवाबदेही किसकी होगी?
6. नगर निगम, पशुपालन विभाग और सरकारी पशु चिकित्सालय के बीच ऐसी आपात स्थिति के लिए कोई समन्वित व्यवस्था क्यों नहीं है?
अब प्रशासन को देना होगा स्पष्ट जवाब
फरियाद हुसैन पिछले तीन दिनों से अपनी रोजी-रोटी का काम छोड़कर इस बेजुबान के लिए समाधान तलाश रहे हैं। उन्होंने अपनी जिम्मेदारी समझते हुए पशु को सड़क से उठाकर अस्पताल तक पहुंचाया।
अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन भी अपनी जिम्मेदारी निभाएगा?
एक आम नागरिक ने इंसानियत दिखाई है। अब जरूरत है कि सरकारी व्यवस्था संवेदनशीलता और जिम्मेदारी दोनों दिखाए।
I7 News का सवाल—अगर नगर निगम के पास शेल्टर नहीं है और सरकारी पशु अस्पताल भी समाधान नहीं दे पा रहा, तो रेबीज संदिग्ध इस बेजुबान को आखिर कहां ले जाए फरियाद हुसैन?
प्रशासन बताए—इस मामले का जिम्मेदार विभाग कौन है और तत्काल समाधान क्या है?
