हल्द्वानी में NEET की तैयारी कर रही 19 वर्षीय छात्रा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत ने पूरे समाज को झकझोर दिया है।

563 किलोमीटर दूर अपने सपनों को पूरा करने के लिए घर से निकली बेटी अब वापस नहीं लौटेगी।
सवाल सिर्फ एक परिवार का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का भी है जहां लाखों छात्र-छात्राएं प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव, अकेलेपन और मानसिक तनाव के बीच अपने भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं।
क्या हमारे शहरों में बाहर से आने वाले छात्रों के लिए पर्याप्त काउंसलिंग व्यवस्था है? क्या कोचिंग संस्थानों और हॉस्टलों में मानसिक स्वास्थ्य पर पर्याप्त ध्यान दिया जाता है? क्या सरकार और प्रशासन को छात्रों के लिए हेल्पलाइन और नियमित मनोवैज्ञानिक सहायता की व्यवस्था नहीं करनी चाहिए?
पुलिस हर पहलू से जांच कर रही है और सच्चाई जांच के बाद ही सामने आएगी, लेकिन यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि अंकों और रैंक की इस दौड़ में कहीं न कहीं हमारे बच्चे टूट रहे हैं।
अगर आपका कोई दोस्त, भाई, बहन या परिचित मानसिक तनाव से गुजर रहा है, तो उसकी बात सुनिए, उसके साथ खड़े रहिए। कई बार एक बातचीत भी जिंदगी बचा सकती है।
