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संविधान की 5वीं अनुसूची से ही बच सकते हैं पहाड़ – हरीश रावत (पहाड़ी आर्मी)

| October 11, 2024 | 1 year ago | 1 min read

हल्द्वानी में पत्रकार वार्ता

आज हल्द्वानी में पहाड़ी आर्मी संगठन के संस्थापक अध्यक्ष हरीश रावत ने पत्रकारों से बात करते हुए उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र की स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में रहते हुए ही पहाड़ों से जुड़े जल, जंगल और जमीन के कई अधिकार छीन लिए गए थे। इसके चलते उत्तराखंड के लोगों को अपनी संस्कृति और विरासत बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ा। रावत ने संविधान की 5वीं अनुसूची में उत्तराखंड को शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

उत्तराखंड को 5वीं अनुसूची में शामिल करने की मांग

रावत ने बताया कि उत्तराखंड में लंबे समय से सख्त भू-कानून की मांग की जा रही है, साथ ही राज्य को संविधान की 5वीं अनुसूची में शामिल करने की भी आवाज उठाई जा रही है। इस दिशा में आंदोलन को और तेज करने की आवश्यकता है।

ब्रिटिश काल का विशेष दर्जा

हरीश रावत ने विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि 1931 में ब्रिटिश सरकार ने उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों को विशेष दर्जा दिया था, जिसे बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने समाप्त कर दिया। उस समय ‘Scheduled Districts Act 1874’ के तहत उत्तराखंड के अल्मोड़ा और ब्रिटिश गढ़वाल जिलों को ट्राइब स्टेट्स का दर्जा मिला था। रावत ने कहा कि अगर उत्तराखंड को संविधान की 5वीं अनुसूची में शामिल किया जाता है, तो राज्य के लोगों को जल, जंगल और जमीन से जुड़े अधिकार वापस मिल सकते हैं।

संविधान की 5वीं अनुसूची क्यों जरूरी है?

हरीश रावत ने कहा कि 5वीं अनुसूची में शामिल होने से पहाड़ी राज्यों को अतिरिक्त अधिकार मिलते हैं। ये अधिकार जल, जंगल और जमीन के संरक्षण के साथ ही पहाड़ी समाज की संस्कृति और विरासत को सुरक्षित रखने में मदद करते हैं। इसके अलावा, बाहरी लोग इन क्षेत्रों में जमीन नहीं खरीद सकते हैं, जिससे स्थानीय लोगों के अधिकार सुरक्षित रहते हैं। रावत ने बताया कि जौनसार-बाबर क्षेत्र में आज भी 5वीं अनुसूची के तहत कानून लागू हैं, जिसके कारण वहां बाहरी लोगों के लिए जमीन खरीदना मुश्किल है।

उत्तराखंड के लोगों से छीने गए अधिकार

रावत ने बताया कि 1971 में उत्तर प्रदेश सरकार ने पहाड़ी क्षेत्रों का ट्राइब स्टेट्स खत्म कर दिया था, जिसके बाद इन क्षेत्रों के लोगों को मिलने वाले अधिकार भी समाप्त हो गए। इसके अलावा, 1995 में उत्तराखंड के लोगों को नौकरी में मिलने वाले 6 प्रतिशत आरक्षण को भी खत्म कर दिया गया था। इस कारण उत्तराखंड के लोग सड़कों पर उतरे और अलग राज्य की मांग उठी।

संविधान की 5वीं और 6वीं अनुसूची में शामिल होने के फायदे

अगर उत्तराखंड को संविधान की 5वीं अनुसूची में शामिल किया जाता है, तो यहां के युवाओं को केंद्रीय नौकरियों में 7.5 प्रतिशत आरक्षण का लाभ मिलेगा। इसके अलावा, जल, जंगल और जमीन का संरक्षण भी सुनिश्चित होगा। हरीश रावत ने कहा कि आज उत्तराखंड के संसाधनों का जिस तरह से दोहन हो रहा है, उस पर नियंत्रण लगाया जा सकेगा।

भू-कानून और 5वीं अनुसूची की पुरानी मांग

रावत ने कहा कि उत्तराखंड में सख्त भू-कानून की मांग नारायण दत्त तिवारी सरकार के समय से चली आ रही है। 2003 में तिवारी सरकार ने यूपी के भू-कानूनों में संशोधन किया था। 2007 में भुवन चंद्र खंडूड़ी सरकार ने भी भू-कानूनों को और कड़ा किया था, लेकिन 2017 में त्रिवेंद्र सरकार ने कई बदलाव किए, जिससे फिर से ये मुद्दा चर्चा में आ गया।

20 अक्टूबर को हल्द्वानी में अधिवेशन

हरीश रावत ने घोषणा की कि 20 अक्टूबर को हल्द्वानी में संविधान की 5वीं अनुसूची को लेकर एक बड़ा अधिवेशन होगा। इसमें पर्वतीय समाज के इतिहासकार, लेखक, अधिवक्ता, शिक्षाविद, समाजसेवी और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।पत्रकार वार्ता में उत्तराखंड एकता मंच के एडवोकेट संजय राठोर, कैलाश डालाकोटी और गौरव सिंह भी उपस्थित थे।

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