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उत्तर प्रदेश के संभल हिंसा मामले में एक बार फिर बड़ा और चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया है।

| January 21, 2026 | 7 months ago | 1 min read

पुलिस अधिकारियों पर मुकदमे का आदेश बना सुर्खी

CJM का यह आदेश सामने आते ही संभल जिले में प्रशासनिक और पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया था। आमतौर पर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ ऐसे आदेश कम ही देखने को मिलते हैं, ऐसे में यह फैसला कानून व्यवस्था और जवाबदेही के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा था। इस आदेश को पीड़ित पक्ष ने न्याय की जीत बताया था, जबकि पुलिस महकमे में इसे लेकर असहजता साफ नजर आई।

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एसपी का बयान— मुकदमा दर्ज नहीं करेंगे

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<p class=अदालत के आदेश के बाद संभल जिले के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार बिश्नोई का बयान भी सामने आया था। उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि पुलिस इस आदेश के तहत मुकदमा दर्ज नहीं करेगी। एसपी ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जाएगी और इसके खिलाफ अपील दायर की जाएगी। इस बयान के बाद मामला और ज्यादा संवेदनशील हो गया था।

कोर्ट बनाम पुलिस की टकराहट?

एक ओर अदालत पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने का आदेश दे रही थी, तो दूसरी ओर पुलिस प्रशासन खुले तौर पर उस आदेश को मानने से इनकार करता नजर आया। इस स्थिति ने कानून व्यवस्था, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और पुलिस की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। सोशल मीडिया और सिविल सोसायटी में भी इस मुद्दे पर तीखी बहस देखने को मिली।

अब CJM का तबादला, नई बहस शुरू

अब इसी बीच CJM विभांशु सुधीर के तबादले की खबर सामने आने से पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया है। उन्हें संभल से सुल्तानपुर स्थानांतरित कर दिया गया है। तबादले का समय और परिस्थितियां लोगों को सोचने पर मजबूर कर रही हैं। कई लोग इसे महज संयोग मानने को तैयार नहीं हैं।

प्रशासन बोला— नियमित तबादला प्रक्रिया

हालांकि प्रशासनिक स्तर पर इस तबादले को पूरी तरह नियमित प्रक्रिया बताया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि न्यायिक अधिकारियों के तबादले समय-समय पर होते रहते हैं और इसे किसी आदेश या फैसले से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। लेकिन जमीन पर हकीकत यह है कि आम लोगों के बीच इस दलील को लेकर संदेह बना हुआ है।

सवालों के घेरे में सिस्टम

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या संवेदनशील मामलों में सख्त फैसले लेने वाले अधिकारियों पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाया जाता है? क्या न्यायिक स्वतंत्रता पूरी तरह सुरक्षित है? संभल हिंसा मामला अब केवल कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही का बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।

आगे क्या होगा? सभी की नजरें हाईकोर्ट पर

फिलहाल अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि उच्च न्यायालय में इस मामले पर क्या रुख अपनाया जाता है। क्या पुलिस अधिकारियों पर मुकदमा दर्ज होगा या मामला कानूनी दांव-पेच में उलझकर ठंडे बस्ते में चला जाएगा? CJM के तबादले के बाद यह मामला और ज्यादा संवेदनशील और चर्चित हो गया है।


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