हल्द्वानी को मिला नया ज़िला समन्वयक
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हल्द्वानी शहर की साफ-सफाई व्यवस्था को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार सफाई कर्मचारी अक्सर गायब नजर आते हैं, और इस बार भी स्थिति में कोई सुधार देखने को नहीं मिल रहा है। शहर के विभिन्न क्षेत्रों में कूड़ा-करकट का अंबार लग चुका है, लेकिन सफाई कर्मचारी और उनके सुपरवाइजर दोनों ही इस गंभीर समस्या को नज़रअंदाज कर रहे हैं। स्थिति इतनी विकट हो गई है कि अब शहर के निवासियों के लिए साफ-सफाई एक दूर का सपना बन गया है।

नगर निगम के सफाई कर्मचारियों का गायब रहना कोई नई बात नहीं है। आए दिन विभिन्न इलाकों में कूड़ा फैलता जा रहा है, लेकिन इसे उठाने वाला कोई नहीं होता। सुबह-सुबह गलियों और सड़कों पर फैला कचरा अब आम दृश्य बन गया है। इससे न केवल शहर की स्वच्छता प्रभावित हो रही है, बल्कि बीमारी फैलने का भी खतरा बना हुआ है। कई बार स्थानीय लोग नगर निगम के अधिकारियों को इस समस्या से अवगत कराते हैं, लेकिन हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगती है।

सफाई कर्मचारियों की गैरमौजूदगी के पीछे उनके सुपरवाइजरों की भी बड़ी भूमिका है। सुपरवाइजरों का काम होता है कि वे कर्मचारियों की हाजिरी लें और यह सुनिश्चित करें कि शहर के हर कोने में सफाई हो रही है। लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है। कई इलाकों में तो सुपरवाइजर खुद भी गायब रहते हैं और सफाई कर्मचारियों की स्थिति को नजरअंदाज कर देते हैं। जब तक सुपरवाइजर खुद इस स्थिति को गंभीरता से नहीं लेंगे, तब तक इस समस्या का समाधान संभव नहीं है।
यहां तक कि सफाई के लिए निर्धारित मासिक शुल्क को लेकर भी सफाई कर्मचारी कई बार बंद दुकानदारों से विवाद करते नजर आते हैं। दुकानें बंद होने के बावजूद, सफाई कर्मचारी जबरन मासिक शुल्क की मांग करते हैं और इसको लेकर कई बार दुकानदारों के साथ बहस भी होती है। इससे स्थिति और भी खराब हो जाती है, क्योंकि सफाई करने के बजाय कर्मचारी ऐसे विवादों में उलझ जाते हैं। यह न केवल दुकानदारों के लिए परेशानी का कारण बनता है, बल्कि शहर की सफाई व्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है।
शहर के लोग कई बार नगर निगम के खिलाफ शिकायत दर्ज कराते हैं, लेकिन उनकी शिकायतें अक्सर अनसुनी रह जाती हैं। लोगों का कहना है कि जब वे नगर निगम कार्यालय में फोन करते हैं या शिकायत दर्ज कराते हैं, तो उन्हें सिर्फ आश्वासन मिलता है। लेकिन वास्तव में, कोई भी समस्या का समाधान नहीं करता। लोगों का कहना है कि नगर निगम के अधिकारी उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लेते और यही कारण है कि शहर की सफाई व्यवस्था दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है।
शहर में सफाई की खराब स्थिति से न केवल सौंदर्य बिगड़ रहा है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। कूड़े के ढेर में जमा होने वाला पानी मच्छरों के लिए उपयुक्त स्थान बन गया है, जिससे डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। इसके अलावा, बदबू और गंदगी से भी लोग परेशान हैं। कई इलाकों में तो स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि वहां पर सांस लेना भी मुश्किल हो गया है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति और भी खतरनाक है, क्योंकि उनकी इम्यूनिटी पहले से ही कमजोर होती है।
नगर निगम की उदासीनता इस पूरी समस्या का मुख्य कारण है। कर्मचारियों की गैरमौजूदगी और सुपरवाइजरों की लापरवाही के बावजूद, नगर निगम इस समस्या का समाधान निकालने में असफल रहा है। नगर निगम के अधिकारियों का कहना है कि वे इस समस्या से वाकिफ हैं, लेकिन कर्मचारियों की कमी और संसाधनों की अनुपलब्धता के कारण वे कुछ नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन यह तर्क शहरवासियों के लिए अस्वीकार्य है, क्योंकि यह उनकी जिंदगी से जुड़ा मुद्दा है।
हालांकि स्थिति काफी गंभीर है, फिर भी कुछ समाधान किए जा सकते हैं। सबसे पहले, नगर निगम को अपने कर्मचारियों की हाजिरी पर सख्त निगरानी रखनी चाहिए। इसके अलावा, सुपरवाइजरों को उनकी जिम्मेदारियों का एहसास दिलाना होगा और उनके काम की समीक्षा करनी होगी। दूसरी ओर, लोगों को भी जागरूक होना होगा और वे अपनी शिकायतों को दर्ज कराने में संकोच नहीं करें। यदि जरूरत पड़े, तो वे सामूहिक रूप से अपनी बात को उठाने के लिए नगर निगम के सामने प्रदर्शन कर सकते हैं।
शहर की सफाई व्यवस्था की यह दयनीय स्थिति एक बड़े संकट का संकेत है। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह समस्या और भी विकराल रूप धारण कर सकती है। नगर निगम को चाहिए कि वह अपने कर्मचारियों की उपस्थिति और काम की गुणवत्ता पर ध्यान दे, ताकि शहरवासियों को स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण मिल सके। शहर के लोगों को भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना होगा और इस मुद्दे को सुलझाने के लिए एकजुट होकर आवाज उठानी होगी।
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