मंदिर के पीछे मिले तीन दिन से लापता प्रेमी-प्रेमिका के शव
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धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री उर्फ बागेश्वर बाबा का हालिया बयान इन दिनों सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक ज़ोरदार चर्चा में है। बाबा ने साफ शब्दों में कहा कि देश में हिंदू–मुस्लिम की राजनीति बंद होनी चाहिए और सरकार को रोज़गार, शिक्षा और विकास जैसे बुनियादी मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। उनके इस बयान ने एक बार फिर देश की प्राथमिकताओं पर बहस छेड़ दी है।
बागेश्वर बाबा का यह बयान खासतौर पर युवाओं के बीच तेज़ी से वायरल हो रहा है। समर्थकों का कहना है कि बाबा ने वही कहा है, जो आज का युवा महसूस कर रहा है। बेरोज़गारी, महंगाई और भविष्य की चिंता के बीच धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति से लोग ऊब चुके हैं। ऐसे में एक धार्मिक संत द्वारा रोज़गार की बात करना कई लोगों को सटीक और साहसिक लग रहा है।
हालांकि, इस बयान के साथ एक डर भी सामने आया है। आम लोगों के बीच यह चर्चा है कि कहीं किसी विशेष राजनीतिक पार्टी के कट्टर समर्थक बागेश्वर बाबा को भी “देशद्रोही” करार न देने लगें। बीते कुछ वर्षों में कई उदाहरण सामने आए हैं, जहां अलग या असहज सवाल उठाने वालों को निशाने पर लिया गया।
एक्स (ट्विटर), फेसबुक और इंस्टाग्राम पर #BageshwarBaba और #SachKiBaat जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। एक वर्ग बाबा के बयान को राष्ट्रहित में बताया रहा है, तो वहीं दूसरा वर्ग इसे राजनीति से जोड़कर देख रहा है। कमेंट सेक्शन में लोग खुलकर पूछ रहे हैं—“क्या अब रोज़गार की बात करना भी विवाद बन गया है?”
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल बागेश्वर बाबा के बयान तक सीमित नहीं है। यह देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सहिष्णुता और लोकतांत्रिक सोच से भी जुड़ा है। सवाल यह है कि क्या देश अब उस दौर में पहुंच गया है, जहां हर बात को राजनीतिक चश्मे से देखा जाएगा?
आम जनता के बीच अब यही सवाल गूंज रहा है—क्या देश की असली समस्याओं पर बात करना गलत है? बागेश्वर बाबा का यह बयान एक बार फिर इस बहस को हवा दे गया है कि राष्ट्रहित की बात को समर्थन मिलेगा या विवाद में घसीटा जाएगा।
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