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हर साल की तरह इस बार भी उर्से रज़वी का आयोजन हो रहा है। इस उर्स की ख़ासियत यह है कि यहां न तो मेला होता है, न कोई ठेला, और न ही कोई गैर-इस्लामी गतिविधि। बावजूद इसके, लाखों अकीदतमंद यहां शिरकत करने आते हैं। इसका मुख्य कारण मसलके आला हज़रत की शिक्षा है, जो शरीयत की हिफाज़त का पैगाम देती है।
उर्से रज़वी में शिरकत करने वालों की संख्या लाखों में होती है। लोग दूर-दूर से आते हैं, सिर्फ अपने इमाम से मोहब्बत और अदब का इज़हार करने के लिए। यह उर्स अपनी अलग पहचान रखता है क्योंकि यहां किसी तरह की गैर-इस्लामी गतिविधि नहीं होती, जो इसे खास बनाती है।
उर्से रज़वी की एक और ख़ासियत यह है कि इसमें औरतों की शिरकत नहीं होती। आम तौर पर देखा जाता है कि उर्सों में औरतें भी बड़ी संख्या में शामिल होती हैं, लेकिन यहां शरीयत के उसूलों का खास ख्याल रखा जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि औरतों की अहमियत को नजरअंदाज किया जाता है, बल्कि उनकी हिफाज़त और इज्जत के मद्देनजर यह फैसला लिया जाता है।

उर्से रज़वी में कव्वाली और अन्य गैर-इस्लामी रस्मों की इजाजत नहीं दी जाती। इसके पीछे मकसद यह है कि इस्लामी उसूलों का पालन हो और मसलके आला हज़रत की तालीमात को अमल में लाया जाए। आमतौर पर उर्सों में कव्वाली और म्यूजिक का चलन होता है, लेकिन यहां यह सब नहीं होता, जो इसे बाकी उर्सों से अलग बनाता है।
मसलके आला हज़रत का असली मकसद है शरीयत की हिफाजत करना। यह उर्स इसी पैगाम को आगे बढ़ाता है। यहां आने वाले हर अकीदतमंद को शरीयत का पालन करने का संदेश दिया जाता है। इस उर्स की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यह शरीयत और इस्लामी तालीमात की हिफाजत के लिए काम करता है।
आला हज़रत, इमाम अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी (1856-1921), भारत के मशहूर इस्लामी विद्वान, मुफ़्ती और सुन्नी बरेलवी मसलक के संस्थापक थे। उनका पूरा जीवन इस्लाम की सेवा और शरीयत की हिफाजत में गुज़रा। आला हज़रत ने इस्लामी तालीमात को बढ़ावा देने के लिए सैकड़ों किताबें लिखीं, जिनमें फ़िक्ह, हदीस, तफ़सीर, और अक़ीदत से संबंधित विषय शामिल हैं।
आला हज़रत का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने इस्लाम के सही उसूलों को लोगों तक पहुंचाया और उन्हें गैर-इस्लामी तालीमात से दूर रखा। उन्होंने बदअमली, शिर्क, और बिदअत के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की और मसलके आला हज़रत की स्थापना की, जो पूरी दुनिया में सुन्नी मुसलमानों के बीच मशहूर हुआ।
उनकी प्रमुख किताबों में “फ़तावा रज़विया” खास है, जिसमें उन्होंने शरीयत के विभिन्न पहलुओं पर फतवे दिए हैं। आला हज़रत का संदेश था कि मुसलमान शरीयत का सख्ती से पालन करें और दुनिया की गैर-इस्लामी चीजों से दूर रहें। उनकी तालीमात आज भी लाखों लोगों के लिए रहनुमा बनी हुई हैं, और उनका उर्से रज़वी हर साल बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।
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