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उत्तराखंड में किताबों पर सियासत: “फीस एक्ट लाए सरकार” – दीपक बल्यूटिया का बड़ा बयान

| April 9, 2026 | 2 months ago | 0 min read

काठगोदाम। उत्तराखंड में स्कूल किताबों को लेकर उठे विवाद ने अब तूल पकड़ लिया है। ने सरकार और शिक्षा विभाग पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा कि यदि सरकार वास्तव में जनता की हितैषी है, तो उसे जल्द फीस एक्ट लागू करना चाहिए।

📌 आरोपों को बताया निराधार

इंस्पिरेशन स्कूल के प्रबंधक दीपक बल्यूटिया ने प्रशासन और शिक्षा विभाग द्वारा लगाए गए आरोपों को पूरी तरह खारिज किया। उनका कहना है कि विद्यालय ने किसी भी अभिभावक पर किसी विशेष दुकान से किताब खरीदने का कोई दबाव नहीं बनाया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि किताबों की सूची माननीय उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप तैयार कर स्कूल की आधिकारिक वेबसाइट पर पहले ही उपलब्ध करा दी गई थी, ताकि अभिभावकों को कोई परेशानी न हो।

📚 किताबों के दाम पर बड़ा सवाल

बल्यूटिया ने सबसे बड़ा सवाल किताबों की कीमत को लेकर उठाया। उनका कहना है कि

  • की दिल्ली से प्रकाशित किताबें सस्ती हैं
  • जबकि उत्तराखंड में छपी वही किताबें कहीं ज्यादा महंगी मिल रही हैं

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जहां दिल्ली की किताब 65 रुपये में मिलती है, वहीं उत्तराखंड की वही किताब काफी अधिक कीमत पर बेची जा रही है। ऐसे में यह अंतर करोड़ों रुपये तक पहुंच रहा है, जो किसी बड़े घालमेल की ओर इशारा करता है।

❗ निजी स्कूलों पर दबाव का आरोप

बल्यूटिया ने आरोप लगाया कि राज्य में निजी विद्यालयों पर अप्रत्यक्ष रूप से उत्तराखंड में प्रकाशित किताबें खरीदने का दबाव बनाया जा रहा है।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इन किताबों को खुले बाजार में बेचने की अनुमति वास्तव में ली गई है? यदि नहीं, तो फिर इन्हें क्यों बेचा जा रहा है और किसे इसका लाभ मिल रहा है?

🏛️ सरकार से जवाब की मांग

उन्होंने कहा कि

  • सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि किताबों के मूल्य में इतना अंतर क्यों है
  • क्या निजी स्कूलों में इन किताबों की आपूर्ति के लिए वैध अनुमति ली गई है
  • और इस पूरे मामले में आखिर लाभ किसे पहुंच रहा है

⚖️ “फीस एक्ट लाना ही होगा”

अंत में बल्यूटिया ने कहा कि यदि सरकार सच में अभिभावकों और छात्रों के हित में काम करना चाहती है, तो उसे जल्द से जल्द फीस एक्ट लागू करना चाहिए, जिससे शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता आए।


👉 यह मामला अब सिर्फ किताबों की कीमत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता और नीतियों पर भी बड़े सवाल खड़े कर रहा है। आने वाले समय में सरकार की प्रतिक्रिया इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगी।

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