नागपुर के छात्र का परीक्षा केंद्र अबू धाबी! शिक्षा व्यवस्था की बड़ी चूक या छात्रों के भविष्य से खिलवाड़?

विशेष रिपोर्ट | I7 News
देश में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं, लेकिन इस बार एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। महाराष्ट्र के नागपुर निवासी छात्र अब्दुल्लाह मोहम्मद तालिब के साथ हुई घटना ने न केवल उसके परिवार को सदमे में डाल दिया है, बल्कि लाखों छात्रों और अभिभावकों के बीच भी चिंता पैदा कर दी है।


जानकारी के अनुसार, अब्दुल्लाह मोहम्मद तालिब 21 जून को आयोजित होने वाली Re-NEET परीक्षा की तैयारी में जुटा हुआ था। वह लंबे समय से इस परीक्षा के लिए मेहनत कर रहा था और अपने भविष्य को बेहतर बनाने का सपना देख रहा था। लेकिन जब उसने परीक्षा का एडमिट कार्ड डाउनलोड किया, तो उसमें दर्ज परीक्षा केंद्र देखकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
एडमिट कार्ड में उसका परीक्षा केंद्र अबू धाबी (संयुक्त अरब अमीरात) दर्शाया गया था। एक ऐसे छात्र के लिए, जो नागपुर में रहकर परीक्षा की तैयारी कर रहा है, अचानक विदेश में परीक्षा केंद्र आवंटित होना बेहद चौंकाने वाला मामला है।
परिवार के अनुसार उनके पास न तो पासपोर्ट है, न ही विदेश जाने की कोई तैयारी थी और न ही इतनी कम अवधि में विदेश यात्रा की व्यवस्था करना संभव है। परीक्षा से ठीक पहले सामने आई इस स्थिति ने पूरे परिवार को मानसिक तनाव में डाल दिया है।
छात्र के परिजनों का कहना है कि उन्होंने कभी विदेश में परीक्षा केंद्र के लिए आवेदन नहीं किया था। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर परीक्षा केंद्र आवंटन की प्रक्रिया में इतनी बड़ी गलती कैसे हो गई? क्या यह तकनीकी त्रुटि है, डेटा एंट्री की गलती है या फिर किसी स्तर पर लापरवाही का मामला?
इस घटना का सबसे दुखद पहलू यह है कि इसका सीधा असर छात्र के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा है। परिजनों के मुताबिक, छात्र बेहद निराश है और लगातार रो रहा है। वह यह तक कह रहा है कि अब वह परीक्षा नहीं देना चाहता। जिस परीक्षा के लिए उसने महीनों तक तैयारी की, उसी परीक्षा को लेकर अब उसके मन में डर और असहायता की भावना पैदा हो गई है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतियोगी परीक्षाएं पहले ही छात्रों पर अत्यधिक मानसिक दबाव डालती हैं। ऐसे में यदि परीक्षा प्रबंधन में इस तरह की गंभीर त्रुटियां होती हैं, तो इसका प्रभाव केवल परीक्षा परिणाम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि छात्रों के आत्मविश्वास और भविष्य पर भी पड़ता है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न राष्ट्रीय परीक्षाओं को लेकर लगातार विवाद सामने आते रहे हैं। कभी पेपर लीक के आरोप, कभी परिणामों में गड़बड़ी, कभी तकनीकी समस्याएं और अब परीक्षा केंद्र आवंटन को लेकर सवाल। ऐसे मामलों ने परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर बहस को और तेज कर दिया है।
सोशल मीडिया पर भी इस घटना को लेकर लोगों की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कई लोगों का कहना है कि यदि किसी छात्र को परीक्षा केंद्र हजारों किलोमीटर दूर या किसी दूसरे देश में आवंटित हो जाए, तो यह केवल एक तकनीकी गलती नहीं बल्कि पूरी प्रणाली की जवाबदेही पर सवाल है। वहीं कुछ लोगों ने मांग की है कि संबंधित एजेंसी तत्काल मामले की जांच करे और छात्र को उसके निवास स्थान के निकट परीक्षा केंद्र उपलब्ध कराया जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल सिस्टम और ऑनलाइन प्रक्रियाओं के इस दौर में ऐसी गलतियों की गुंजाइश न्यूनतम होनी चाहिए। यदि फिर भी ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, तो यह दर्शाता है कि निगरानी और सत्यापन तंत्र में कहीं न कहीं गंभीर कमी मौजूद है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या छात्र को समय रहते न्याय मिलेगा? क्या उसकी वर्षों की मेहनत एक प्रशासनिक या तकनीकी त्रुटि की भेंट चढ़ जाएगी? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाएंगे?
अब्दुल्लाह मोहम्मद तालिब का मामला केवल एक छात्र की परेशानी नहीं है, बल्कि यह उन लाखों युवाओं की चिंता का प्रतीक है जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं और उम्मीद करते हैं कि परीक्षा प्रणाली उनके साथ निष्पक्ष और जिम्मेदार व्यवहार करेगी। यदि व्यवस्था उनकी मेहनत की रक्षा नहीं कर पाती, तो यह केवल एक छात्र की हार नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता मानी जाएगी।
